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छत्तीसगढ़ जलसंसाधन विभाग में करोड़ों की खुली लूट...रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव में कागज़ों में बहती नहरें, ज़मीन पर सूखा

 

छत्तीसगढ़ जलसंसाधन विभाग में करोड़ों की खुली लूट

रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव में कागज़ों में बहती नहरें,ज़मीन पर सूखा

रायपुर// छत्तीसगढ़ जलसंसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य के बड़े शहरों और संभागीय मुख्यालयों—रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव और कोरबा—में संचालित सिंचाई एवं जल संरचना योजनाओं में एक जैसा पैटर्न सामने आ रहा है। योजनाएं कागज़ों में पूरी, भुगतान पूरा, लेकिन खेतों तक पानी नहीं।

सूत्रों और स्थानीय शिकायतों के आधार पर सामने आए तथ्यों ने यह आशंका मजबूत कर दी है कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित अनियमितताओं का मामला हो सकता है।

रायपुर: नहर बनी,पानी गायब

राजधानी रायपुर से लगे ग्रामीण क्षेत्रों में कई लघु और मध्यम सिंचाई नहर परियोजनाएं वर्षों पहले स्वीकृत की गई थीं। विभागीय रिकॉर्ड में इनका कार्य पूर्ण बताया गया है, लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि नहरों में पानी की आपूर्ति आज तक नियमित नहीं हो सकी।

  • किसानों का कहना है कि
  • कहीं नहरों की ढाल गलत है
  • कहीं वितरण चैनल अधूरे हैं

तो कहीं जल स्रोत से जोड़ने का काम ही अधूरा छोड़ दिया गया

इसके बावजूद निर्माण एजेंसियों को पूरा भुगतान कर दिया गया, जिससे निरीक्षण और गुणवत्ता जांच पर सवाल उठ रहे हैं।

बिलासपुर: पहली बारिश में बह गई गुणवत्ता

बिलासपुर संभाग में जलसंसाधन विभाग द्वारा कराए गए कई निर्माण कार्य पहली ही मानसूनी बारिश में क्षतिग्रस्त हो गए। नहरों की दीवारों में दरारें, स्लैब टूटना और मिट्टी का बह जाना आम शिकायत बन चुकी है।

  • स्थानीय लोगों का आरोप है कि
  • घटिया सामग्री का उपयोग हुआ
  • निर्धारित मोटाई और मजबूती का पालन नहीं किया गया

फिर भी कार्य को संतोषजनक बताकर भुगतान स्वीकृत किया गया,यह स्थिति निर्माण गुणवत्ता की गंभीर अनदेखी की ओर इशारा करती है।

दुर्ग–भिलाई: टेंडर से पहले ही ठेके तय?

दुर्ग और भिलाई क्षेत्र में टेंडर प्रक्रिया को लेकर सबसे ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि

  • सीमित ठेकेदारों को बार-बार काम दिया गया
  • प्रतिस्पर्धी बोली की स्थिति नहीं बनने दी गई
  • तकनीकी शर्तें कुछ खास एजेंसियों के अनुकूल रखी गईं

यदि इन टेंडरों की फाइलें खंगाली जाएं, तो यह स्पष्ट हो सकता है कि क्या प्रक्रिया पारदर्शी थी या पहले से तय।

राजनांदगांव और कोरबा: किसानों को सिर्फ आश्वासन

राजनांदगांव और कोरबा जिलों में कई गांवों में सिंचाई योजनाओं के नाम पर केवल सर्वे, शिलान्यास और सूचना बोर्ड तक सीमित काम हुआ। खेतों तक पानी पहुंचाने वाली संरचनाएं आज भी अधूरी हैं।

  • किसानों का कहना है कि
  • हर साल नए आश्वासन मिलते हैं
  • लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है

शिकायत करने पर अधिकारी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल देते हैं। यह स्थिति योजनाओं के उद्देश्य पर ही सवाल खड़ा करती है।

तकनीकी स्वीकृति या सुनियोजित मिलीभगत?

तकनीकी स्वीकृति, मापन पुस्तिका (MB), कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र और भुगतान रिकॉर्ड—इन सभी में विरोधाभास मिलना गंभीर संकेत है। कई मामलों में

  • माप पुस्तिका में दर्शाया गया कार्य मौके पर नहीं मिला
  • निरीक्षण तिथियां संदेहास्पद पाई गईं
  • एक ही दिन में कई कार्यों का निरीक्षण दिखाया गया

यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह केवल कागजी खानापूर्ति थी?

जनता के पैसों की बर्बादी, किसानों के अधिकारों पर चोट

जलसंसाधन विभाग की इन कथित गड़बड़ियों का सीधा असर किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। जिन योजनाओं से फसल उत्पादन बढ़ना था, वे योजनाएं कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया बनती दिख रही हैं।

  • यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि
  • किसानों के भरोसे की टूट
  • सरकारी योजनाओं की साख पर चोट
  • और विकास की रफ्तार पर ब्रेक
  • जैसा मामला बनता जा रहा है।

अब बड़ा सवाल—कार्रवाई कब?

अब जनता के सामने सवाल साफ है—

  • क्या इन योजनाओं की स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय जांच होगी?
  • क्या दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई होगी?
  • या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

छत्तीसगढ़ की जनता अब जांच रिपोर्ट नहीं, जवाबदेही और कार्रवाई चाहती है।

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