जांच टीम बनी, कार्रवाई शून्य: क्या प्रशासन सिर्फ काग़ज़ी औपचारिकताओं तक सीमित है...?
मुंगेली// जिले के पथरिया विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत कंचनपुर के आश्रित ग्राम टोनहीचुवा में शासकीय भूमि पर अवैध कब्ज़े और निजी स्कूल निर्माण के गंभीर प्रकरण में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) द्वारा 20 नवंबर 2025 को बाकायदा जांच टीम का गठन किया गया। आदेश में स्पष्ट रूप से शिकायत की गंभीरता स्वीकार करते हुए,तहसीलदार पथरिया श्रीमती छाया अग्रवाल की अध्यक्षता में राजस्व अधिकारियों और पटवारियों की संयुक्त टीम बनाई गई। जिसमें चंदन कुमार दुबे-नायब तहसीलदार पथरिया,रामदास कोरी-राजस्व निरीक्षक, नरेन्द्र ताण्डे- पटवारी,मुकेश पाण्डेय-पटवारी, अजय कुमार साहू-पटवारी शामिल हैं।
जब जांच टीम गठित हो चुकी है, तो अब तक न जांच हुई, न प्रतिवेदन आया और न ही कोई कार्रवाई क्यों?
क्या आदेश सिर्फ फाइल की शोभा बढ़ाने के लिए थे...?
जिस प्रकरण में शासकीय भूमि पर अवैध निर्माण की बात सामने आई हो, वहां त्वरित स्थल निरीक्षण, सीमांकन और कब्जा हटाने जैसी कार्रवाई प्राथमिकता होनी चाहिए थी। लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर चुप्पी बनी हुई है।
प्रशासन की निष्क्रियता या मिलीभगत...?
जब आदेश जारी करने वाला कार्यालय ही अपने आदेश का पालन नहीं कराता, तो यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े करती है। क्या कारण है कि जिन अधिकारियों को जांच सौंपी गई, वे अब तक मौन हैं?
क्या अवैध निर्माण करने वालों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है..?
शिकायतकर्ता को न्याय कब मिलेगा?
आदेश में स्पष्ट उल्लेख है कि जांच कर प्रतिवेदन निर्धारित समय-सीमा में प्रस्तुत किया जाना था। लेकिन न तो शिकायतकर्ता को कोई सूचना दी गई और न ही सार्वजनिक रूप से किसी कार्रवाई की जानकारी दी गई। इससे आम नागरिकों में यह संदेश जाता है कि शिकायत करना व्यर्थ है।
राजस्व व्यवस्था पर उठते सवाल
यह पहला मामला नहीं है। प्रदेश भर में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आ चुके हैं जहां—
➤ जांच दल बनते हैं
➤ नोटशीट चलती है
➤ आदेश निकलते हैं
➤ लेकिन जमीनी कार्रवाई शून्य रहती है।
अब जवाब चाहिए, बहाने नहीं
प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए—
👉 जांच टीम ने अब तक क्या किया?
👉 स्थल निरीक्षण हुआ या नहीं?
👉 अवैध निर्माण को क्यों नहीं रोका गया?
👉 विलंब के लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं?
यदि प्रशासन समय रहते जवाबदेही तय नहीं करता, तो यह मामला केवल एक अवैध निर्माण का नहीं रहेगा, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न बन जाएगा।
काग़ज़ पर चलने वाला शासन नहीं, ज़मीन पर दिखने वाली कार्रवाई ही सुशासन की पहचान होती है।
अब निगाहें प्रशासन पर: कार्रवाई कब?
जांच टीम के गठन को लंबा समय बीत चुका है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर अब तक न कोई जांच दिखाई दी है और न ही किसी तरह की ठोस कार्रवाई। आदेश जारी होने के बाद भी यदि प्रशासन मौन बना रहता है, तो यह न केवल शासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि आम नागरिकों के न्याय पाने के अधिकार को भी कमजोर करता है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर प्रकरण में कानून का पालन सुनिश्चित करता है या फिर जांच आदेश भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाते हैं। क्या अवैध निर्माण पर समय रहते रोक लगेगी, या फिर कार्रवाई की देरी अपने-आप में दोषियों को संरक्षण देती रहेगी—यह आने वाला समय तय करेगा।
जनता और मीडिया की निगाहें अब पूरी तरह प्रशासन पर टिकी हैं।
कार्रवाई ही जवाब होगी, बयान नहीं।
➽ कलेक्टर जनदर्शन अंतिम विकल्प: जब बाकी सभी दरवाज़े बंद हो जाएँ
प्रशासनिक तंत्र में नियम यह है कि समस्याओं का समाधान पहले निचले और मध्य स्तर पर हो, लेकिन जब जांच के आदेश जारी होने के बावजूद कोई कार्रवाई न हो, तो नागरिकों के पास कलेक्टर जनदर्शन ही अंतिम विकल्प बचता है।
पथरिया क्षेत्र के इस प्रकरण में भी यही स्थिति सामने आ रही है। अनुविभागीय स्तर पर जांच टीम गठित होने के बावजूद महीनों तक कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक तंत्र नीचे से ऊपर तक जाम हो चुका है। परिणामस्वरूप, आम नागरिकों को मजबूरन कलेक्टर जनदर्शन का दरवाज़ा खटखटाना पड़ रहा है।















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