बेदखली आदेश की खुलेआम अवहेलना,अवैध भवन में निजी व सरकारी दोनों स्कूलें संचालित,शिक्षा और कानून दोनों खतरे में...!
जबकि प्रकरण की गंभीरता को स्वीकार करते हुए 20 नवंबर 2025 को अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) द्वारा जांच टीम का गठन किया गया था। टीम की कमान तहसीलदार पथरिया श्रीमती छाया अग्रवाल को सौंपी गई, जिसमें नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और तीन पटवारियों को शामिल किया गया। जिसमें चंदन कुमार दुबे (नायब तहसीलदार), रामदास कोरी (राजस्व निरीक्षक), नरेन्द्र ताण्डे, मुकेश पाण्डेय और अजय कुमार साहू (पटवारी) को शामिल किया गया। लेकिन जांच टीम का गठन कागज़ी कार्रवाई बनकर रह गया, ज़मीन पर नतीजा शून्य है।
सूत्रों से मिली जानकारी उक्त मामले में करीब छः महीने पहले बेदखली आदेश पारित हो चुका हैं, बावजूद इसके न अवैध भवन हटा और न ही स्कूल का संचालन बंद हुआ।
जबकि नियमों के मुताबिक,बेदखली आदेश के बाद यदि अवैध कब्जाधारी कब्जा नहीं छोड़ता है तो बलपूर्वक बेदखली और अवैध निर्माण हटाना प्रशासन की जिम्मेदारी थी, लेकिन प्रशासन ने आंख मूंदे रखीं। आज भी उसी शासकीय भूमि पर निजी स्कूल संचालित हो रहा है, जहां बच्चों की पढ़ाई के नाम पर सरकारी जमीन की खुलेआम अवमानना हो रही है।
कानून कहता है—
अवैध भूमि पर संचालित शैक्षणिक संस्थान न मान्य हो सकता है और न ही संरक्षित। इसके बावजूद शिक्षा विभाग की चुप्पी यह संकेत देती है कि या तो नियमों की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी गई हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यही अवैध कब्ज़ा किसी गरीब या कमजोर वर्ग द्वारा किया गया होता, तो अब तक बुलडोजर चल चुका होता। लेकिन यहां मामला प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा होने के कारण कार्रवाई ठप है। यह प्रशासन की दोहरी नीति को उजागर करता है।
अब सवाल सिर्फ एक अवैध निर्माण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता का है। यदि कलेक्टर और डीईओ जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी इस खुले उल्लंघन पर भी मौन रहते हैं, तो यह संदेश जाता है कि शासकीय भूमि सुरक्षित नहीं,बल्कि प्रभावशाली लोगों के लिए खुली है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जिन अधिकारियों पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी है, वही अधिकारी गोलमोल जवाब देकर मामले को टालते नजर आ रहे हैं। कभी जांच की आड़, तो कभी प्रक्रिया का बहाना बनाकर कार्रवाई को महीनों से लटकाया जा रहा है।
प्रश्न यह भी है कि जब सरकारी भूमि पर बना भवन अवैध घोषित हो चुका है, तो उसमें बच्चों को बैठाकर पढ़ाने की अनुमति किस नियम के तहत दी गई? क्या प्रशासन स्वयं अपने ही आदेशों को निष्प्रभावी करने पर तुला हुआ है?
यह पूरा मामला प्रशासनिक निष्क्रियता, संभावित संरक्षण और नियम-कानून के दोहरे मापदंडों की ओर इशारा करता है। आम नागरिकों के छोटे-छोटे अतिक्रमणों पर तुरंत कार्रवाई करने वाला तंत्र, यहां इतने गंभीर और दस्तावेज़ी रूप से सिद्ध मामले में मौन क्यों है—यह बड़ा सवाल है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन और उच्च अधिकारी इस प्रकरण में कब तक जांच के नाम पर समय खींचते रहेंगे, और क्या अवैध कब्ज़े पर वास्तव में बुलडोज़र चलेगा या फिर आदेश कागज़ों में ही दफन होकर रह जाएंगे।















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