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एक साल से ज्यादा का कार्यकाल, न नई योजना न पुराना फंड जारी — 15वें वित्त आयोग की राशि अब भी फाइलों में कैद

 बीजेपी सरकार में पंचायतें बेहाल, खाते खाली — गांवों का विकास सत्ता की प्राथमिकता से बाहर !

एक साल से ज्यादा का कार्यकाल, न नई योजना न पुराना फंड जारी — 15वें वित्त आयोग की राशि अब भी फाइलों में कैद

रायपुर // छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार बने एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन ग्रामीण विकास की बुनियाद कही जाने वाली पंचायतें आज इतिहास की सबसे कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी हैं। गांवों के विकास का दावा करने वाली सरकार के कार्यकाल में पंचायतों के बैंक खाते खाली पड़े हैं और विकास कार्य पूरी तरह ठप हो चुके हैं।

हैरानी की बात यह है कि सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार ने न तो पंचायतों के लिए कोई नई बड़ी योजना शुरू की, और न ही पिछली सरकार के कार्यकाल की 15वें वित्त आयोग की लंबित राशि को जारी करने की कोई गंभीर पहल की। नतीजा यह है कि पंचायतें सिर्फ नाम की रह गई हैं, जबकि फैसले और फंड राजधानी की फाइलों में कैद हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों की मरम्मत रुकी हुई है, नालियां जर्जर हैं, पेयजल संकट गहराता जा रहा है और पंचायत प्रतिनिधि जनता के सामने बेबस और जवाबहीन नजर आ रहे हैं। सवाल यह है कि जब पंचायतों के पास खर्च करने के लिए पैसा ही नहीं होगा, तो विकास किस आधार पर होगा?

पंचायत प्रतिनिधियों का साफ कहना है कि बीजेपी सरकार ने पंचायतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। बार-बार पत्र, प्रस्ताव और मांग के बावजूद शासन स्तर से सिर्फ आश्वासन मिल रहा है, राशि नहीं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार का फोकस घोषणाओं और प्रचार पर ज्यादा है, जबकि जमीनी संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। पंचायतों को आर्थिक रूप से पंगु बनाकर सरकार न केवल ग्रामीण विकास को रोक रही है, बल्कि 73वें संविधान संशोधन की भावना को भी ठेस पहुंचा रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि :

  • क्या बीजेपी सरकार गांवों को सिर्फ वोट बैंक के रूप में देख रही है?
  • 15वें वित्त आयोग की राशि आखिर किसके इशारे पर रोकी गई है?
  • पंचायतों को फंड विहीन कर क्या सत्ता केंद्रीकरण की कोशिश की जा रही है?

ग्रामीण छत्तीसगढ़ आज जवाब मांग रहा है। अगर जल्द ही पंचायतों को फंड और अधिकार नहीं दिए गए, तो आने वाले समय में गांवों का गुस्सा सड़कों पर उतरना तय माना जा रहा है। 

सवाल तो बनता है -

छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार को सत्ता संभाले एक साल से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन राज्य की ग्राम पंचायतें आज भी आर्थिक बदहाली का शिकार हैं। गांवों के विकास की जिम्मेदारी जिन पंचायतों पर है, उनके खाते खाली हैं और विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं। ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री और पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री से सीधे सवाल उठ रहे हैं।

👉 मुख्यमंत्री जी, जब आपकी सरकार “विकसित छत्तीसगढ़” की बात करती है, तो फिर गांवों की पंचायतों के पास खर्च करने के लिए पैसा क्यों नहीं है?

👉 पंचायत मंत्री से जानना जरूरी है कि 15वें वित्त आयोग की वह राशि, जो पिछले कार्यकाल की बताई जा रही है, अब तक पंचायतों को क्यों नहीं मिली..? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या जानबूझकर की गई देरी..?

👉 सरकार बनने के बाद पंचायतों के लिए कौन-सी नई बड़ी योजना शुरू की गई, जिससे गांवों में सड़क, नाली, पेयजल और रोजगार से जुड़े काम आगे बढ़े हों..? अगर कोई योजना है, तो उसका जमीनी असर कहां दिखाई दे रहा है..?

👉 क्या सरकार मानती है कि पंचायतों को फंड विहीन रखकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों को कमजोर किया जा रहा है, ताकि सारी ताकत राजधानी और मंत्रालयों में केंद्रित रहे..?

👉 मनरेगा सहित कई योजनाओं में मजदूरों का भुगतान लंबित है। मुख्यमंत्री जी, क्या गांव के गरीब मजदूर आपकी प्राथमिकता में नहीं हैं..?

👉 73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायतों को अधिकार और संसाधन देने की बात कही गई है। फिर आपकी सरकार में पंचायतें सिर्फ कागजों तक क्यों सिमट कर रह गई हैं..?

👉 सरकार यह स्पष्ट करे कि 15वें वित्त आयोग की लंबित राशि कब तक पंचायतों के खातों में पहुंचेगी..? इसकी कोई समय-सीमा है या नहीं..?

पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि वे जनता के सामने जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। गांवों में काम रुके हुए हैं और लोग सीधे पंचायत भवन आकर पूछ रहे हैं — “सरकार ने पैसा क्यों रोक दिया..?”

🔎 बीजेपी सरकार के दावे और गांवों की हकीकत के बीच गहरी खाई साफ नजर आ रही है। अगर जल्द ही पंचायतों को फंड और अधिकार नहीं मिले, तो यह मुद्दा आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक सवाल बन सकता है। 🔍

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