सड़क निर्माण में नियम-कानून की उड़ रही धज्जियाँ, अवैध खनन बना विकास का नया चेहरा
मुंगेली // जिले में सड़क निर्माण के नाम पर जो कुछ हो रहा है, वह न केवल कानून की खुली अवहेलना है, बल्कि शासन–प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। विकास के नाम पर नियमों को कुचलने का यह खेल अब खुलेआम खेला जा रहा है, और जिम्मेदार अधिकारी मानो आंखें मूंदे बैठे हैं।
स्थानीय ग्रामों से अवैध रूप से मिट्टी निकालकर सड़क निर्माण में उपयोग किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि मिट्टी खनन के लिए नदी, तालाब और सार्वजनिक स्थानों को मुख्य स्रोत बना लिया गया है, जबकि स्पष्ट नियमों के अनुसार इन स्थानों से मिट्टी निकालना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद जेसीबी मशीनें दिन-रात बेखौफ चल रही हैं और प्राकृतिक संसाधनों का खुला दोहन किया जा रहा है।
यह सवाल बेहद गंभीर है कि जब शासन के पास खनिज नियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और राजस्व नियमावली मौजूद हैं, तो फिर इनका पालन क्यों नहीं हो रहा? क्या सड़क निर्माण एजेंसियों को कानून से ऊपर मान लिया गया है? या फिर अवैध खनन को मौन स्वीकृति देकर प्रशासन खुद अपराध में भागीदार बन चुका है?
नदी और तालाबों से मिट्टी निकालने का सीधा असर जलस्तर, पर्यावरण और ग्रामीण जीवन पर पड़ रहा है। आने वाले समय में जल संकट, कटाव और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएं खड़ी होंगी, जिसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या बाद में फिर जांच के नाम पर कागजी खानापूर्ति कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है। ग्रामीण शिकायत कर रहे हैं, वीडियो और तस्वीरें सामने आ रही हैं, लेकिन न तो खनन विभाग हरकत में है और न ही राजस्व व प्रशासनिक अमला। आखिर किसके संरक्षण में यह अवैध खनन फल-फूल रहा है?
- क्या नियम केवल कागजों के लिए बने हैं?
- क्या विकास के नाम पर पर्यावरण और कानून दोनों की बलि चढ़ा दी जाएगी?
- और यदि सब कुछ नियम विरुद्ध है, तो अब तक दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
अब समय आ गया है कि प्रशासन केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई करे। अवैध खनन में संलिप्त ठेकेदारों, अधिकारियों और संरक्षण देने वालों पर सख्त कार्रवाई हो, नुकसान का आकलन कर वसूली की जाए और दोषियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज हों।
वरना यह मान लिया जाएगा कि मुंगेली में कानून नहीं, बल्कि अवैध खनन का राज चल रहा है—जहां सड़कें तो बन रही हैं, लेकिन नियम, पर्यावरण और जनता के अधिकार मलबे में दबते जा रहे हैं।














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