सुरक्षा घेराबंदी के बावजूद खदान परिसर से कोयला चोरी, जांच के घेरे में प्रबंधन
जिले के जिस खदान परिसर में बूम बैरियर, काटाघर, सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा विभाग की सख्त निगरानी रहती है, उसी खदान के भीतर से कोयला तस्करी का मामला सामने आना न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि पूरे खनन तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालिया घटना में खदान के भीतर तीन संदिग्ध गाड़ियों का मिलना संगठित कोयला तस्करी की आशंका को और मजबूत करता है।
सूत्रों के अनुसार, 15 जनवरी की रात कोयला चोरी की शिकायत पर की गई कार्रवाई के दौरान खदान परिसर के भीतर तीन वाहन संदिग्ध अवस्था में खड़े मिले। इनमें ट्रक क्रमांक CG10 BT 5551, CG10 BS 2153 और तीसरा वाहन BR-24 GC-8640 शामिल है। बताया जा रहा है कि ये तीनों वाहन बिना किसी वैध दस्तावेज के खदान परिसर में प्रवेश कर चुके थे। जांच के दौरान दस्तावेज मांगे जाने पर चालक व क्लीनर वाहन छोड़कर फरार हो गए।
कड़ी सुरक्षा के बावजूद कैसे पहुंचे वाहन?
घटना को कई दिन बीत जाने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद संदिग्ध वाहन खदान के भीतर कैसे प्रवेश कर गए। बिना अनुमति, बिना कागजात और बिना रोक-टोक यह पूरा खेल कैसे चलता रहा—यह सवाल अब तक अनुत्तरित है।
बूम बैरियर कर्मियों की भूमिका संदेह के घेरे में
खदान परिसर में किसी भी वाहन का प्रवेश और निकास बूम बैरियर कर्मियों की निगरानी में होता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बूम बैरियर कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी तस्करी संभव है?
काटाघर में ‘वजन के खेल’ की आशंका
नियमों के अनुसार कोयला लोडिंग के बाद प्रत्येक वाहन का काटाघर में वजन अनिवार्य है। इसके बावजूद यदि अवैध कोयले से लदे वाहन बाहर निकल रहे हैं, तो काटाघर कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के दायरे में आती है। क्या वजन प्रक्रिया में हेराफेरी कर तस्करी को रास्ता दिया जा रहा है?
सुरक्षा विभाग की चुप्पी भी सवालों के घेरे में
खदान की सुरक्षा में तैनात विभाग, जिसे करोड़ों रुपये की संपत्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है, वह इस पूरे मामले पर मौन साधे हुए है। लाखों रुपये वेतन पाने के बावजूद यदि सुरक्षा व्यवस्था तस्करी रोकने में विफल है, तो यह चुप्पी भी अपने-आप में कई सवाल खड़े करती है।
महाप्रबंधक की जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?
क्षेत्र के महाप्रबंधक दिलीप माधवराव बोबड़े की भूमिका को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। क्या उनके अधीनस्थ अधिकारी-कर्मचारी उनकी जानकारी के बिना यह सब कर रहे हैं, या फिर यह सब उनकी नाक के नीचे जानबूझकर होने दिया जा रहा है?
रिटायरमेंट से पहले ‘खुली छूट’ के आरोप
सबसे गंभीर आरोप यह है कि क्या रिटायरमेंट से पहले कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों को कोयला व कबाड़ तस्करी की खुली छूट दे दी गई है? यदि ऐसा नहीं है, तो अब तक किसी बड़ी और ठोस कार्रवाई का अभाव क्यों है?
कार्रवाई होगी या फिर लीपापोती?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस मामले में वास्तविक दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी, या फिर पूर्व की तरह जांच के नाम पर लीपापोती कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। पूर्व में भी ऐसे मामलों में कार्रवाई के बजाय फाइलें दबाने के आरोप लगते रहे हैं।
यदि इस बार भी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच नहीं हुई, तो यह साफ संकेत होगा कि खदान के भीतर चल रही कोयला तस्करी को कहीं न कहीं ऊपरी संरक्षण प्राप्त है। अब निगाहें प्रशासन, पुलिस और खनन मुख्यालय पर टिकी हैं—कि वे मिसाल कायम करते हैं या फिर व्यवस्था एक बार फिर सवालों के कटघरे में खड़ी होती है।














0 टिप्पणियाँ